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रचनात्मक बनें!

By: ओशो

किसी फर्श को साफ़ करना अत्यधिक रचनात्मक कार्य हो सकता है। रचनात्मकता का किसी कार्य विशेष के साथ संबंध नहीं होता। रचनात्मकता का संबंध आपकी चेतना की गुणवत्ता से होता है। यदि आप जान जाएं कि रचनात्मकता क्या होती है तो आप जो भी करते हैं वह रचनात्मक हो सकता है।

रचनात्मकता का अर्थ है किसी भी कार्य को चिंतन के रूप में करना; किसी भी कार्य को अत्यधिक प्रेम से करना। क्या आप यह सोच रहे हैं कि यदि आप पेंट करते हैं तो आप रचनात्मक महसूस करेंगे? लेकिन पेंट करना फर्श साफ़ करने की तरह ही एक साधारण कार्य है। आप एक कैनवस पर रंग फेकेंगे। इसी तरह आप फर्श की धुलाई और सफ़ाई के दौरान करते हैं। अंतर क्या है? किसी से बात करने पर आपको महसूस होता है कि समय बर्बाद हुआ है। आप एक महान किताब लिखना चाहते हो; ऐसा करके आप रचनात्मक बन जाएंगे। लेकिन एक मित्र आया है तो थोड़ी सी गपशप करना बहुत अच्छा है। रचनात्मक बनें।

सभी महान धर्म ग्रंथ कुछ और नहीं बल्कि रचनात्मक लोगों की बातचीत ही है। मैं यहां क्या कर रहा हूं? बातचीत। किसी दिन यही सिद्धांत बन जाएंगे लेकिन असल में यह बातचीत है। मुझे ये करने में आनंद आता है। यदि आप सच में कुछ पसंद करते हैं तो वह रचनात्मक हो जाता है।

एक समझदार व्यक्ति हमेशा रचनात्मक होता है। ऐसा नहीं है कि वह रचनात्मक बनने की कोशिश करता है। उसके बैठने का ढंग एक रचनात्मक कार्य होता है। उसे बैठते हुए देखें। आप उसकी गतिविधि में नृत्य का एक निश्चित गुण देखेंगे, एक निश्चित गौरव। जीवन छोटी-छोटी चीज़ों से ही बनता है; बस आपका अहं कहता रहता है कि यह छोटी चीज़ें हैं। आप कुछ महान कार्य करना चाहते हैं– महान कविता। आप शेक्सपियर, कालिदास या मिल्टन बनना चाहते हैं। यह आपका अहं है जो परेशानियां पैदा कर रहा है। अपना अहं दूर करें और देखें, सब कुछ रचनात्मक है। फिर हर चीज़ अत्यधिक महान है। यदि आप प्रेम नहीं करते तो आपका अहं कहता रहेगा, “यह आपके लायक नहीं है।” सफाई करना महान है।

अहं को न पालें। जब अहं आता है और आपको कुछ महान चीज़ों के लिए उकसाता है तो तुरंत सावधान हो जाएं और अहं छोड़ दें और फिर आप स्वयं तुच्छ बातों को पवित्र पाएंगे। अपवित्र कुछ भी नहीं है, सब कुछ पवित्र है।

और जब तक आपके लिए सभी चीज़ें पवित्र नहीं हो जाती, आप धार्मिक नहीं बन सकते। जिसे आप संत कहते हैं वह पवित्र व्यक्ति नहीं है। हो सकता है कि संत केवल अहं के साथ जी रहा हो। और वह आपको संत इसलिए भी दिख रहा हो क्योंकि उसने महान कार्य किए हैं। असल में, एक पवित्र व्यक्ति वह है जो साधारण जीवन पसंद करता हो। लकड़ी काटना, कुएं से पानी ढोना, खाना बनाना – वह जो भी करता है वह पवित्र हो जाता है। ऐसा नहीं है कि वह महान कार्य कर रहा है लेकिन वह जो भी कर रहा है वह महानता से कर रहा है।

महानता किए जाने वाले कार्य में नहीं होती। महानता उस चेतना में होती है जो आप उसे करते हुए लाते हैं। आपके जीवन का प्रत्येक क्षण आपके चिन्तनशील प्रेम द्वारा परिवर्तित होना चाहिए। जब मैं कहता हूं कि रचनात्मक बनें तो मेरा अर्थ यह नहीं है कि आप सब जाकर महान पेंटर या कवि बन जाएं। इसका साधारण सा अर्थ है कि अपने जीवन को पेंटिंग करने दो, अपने जीवन को कविता बनने दो।

स्वयं को कभी महान, प्रसिद्ध, जीवन के आकार से बड़ा बनने की आदत न डालें। जीवन का आकार बिलकुल ठीक है। जीवन के आकार जितना बनना, साधारण बनना, उतना संपूर्ण है जितना होना चाहिए। लेकिन उसे साधारणता से जीना एक असाधारण तरीका है। यही निर्वाणिक चेतना है। यदि निर्वाण आपके जीवन का एक महान लक्ष्य बन जाता है तो आप एक डरावने सपने को जी रहे हैं। लेकिन यदि निर्वाण छोटी चीज़ों में है, जिस तरह से आप उन्हें जीती हैं, जिस प्रकार आप हर छोटी गतिविधि को एक पवित्र कार्य में बदलती हैं, प्रार्थना में, तो आपका घर मंदिर बन जाता है, आपके शरीर में ईश्वर का वास हो जाता है, और आप जो भी देखते हैं या छूते हैं, वह अत्यधिक सुंदर, पवित्र बन जाता है; तब निर्वाण मुक्ति बन जाती है।

 

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